<p style="text-align: justify;">प्रदेश में छोटे एवं मोटे अनाजों में चेना (जेठी सांवा) की खेती केवल जायद में ही होती है। इसे हम जायद सांवा के रूप में भी जानते हैं। इसकी खेती साधारणतया आलू, सरसों, राई एवं गन्ना की फसल कटने के बाद की जाती है। यह फसल 65-70 दिन में पककर तैयार हो जाती है तथा उन्नतिशील विधि से खेती करने पर अच्छी पैदावार देने की क्षमता रखती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">प्रजातियाँ</h3> <p style="text-align: justify;">प्रदेश के समस्त चेना उगाने वाले क्षेत्रों के लिए राज्य प्रजाति विमोचन समिति द्वारा ʺभावनाʺ जाति की संस्तुति की गयी है। यह प्रजाति 12-15 कुन्तल औसम उपज प्रति हे. देती है। यह जाति झुलसा बीमारी एवं तना छेदक कीट तथा तने की मक्खी के लिए अवरोधी पायी गयी है। यह जाति पकने पर चटकती नहीं है और न ही गिरती है। पोषक तत्वों के दृष्टिकोण से भी यह जाति महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें 11 प्रतिशत प्रोटीन की मात्रा पायी जाती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">भूमि की तैयारी</h3> <p style="text-align: justify;">खेत की तैयारी करने से पहले उपयुक्त भूमि का चुनाव अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके लिए अधिक जलधारण शक्ति वाली मिट्टी अच्छी रहती है। पानी के साधनों की उपलब्धता को विशेष रूप से ध्यान में रखना चाहिए। इस फसल के लिए दोमट, हल्की दोमट एवं मटियार जमीन सबसे अच्छी पायी गयी है। खेत की तैयारी के लिए एक पलेवा करना चाहिए और जैसे ही ओट आ जाये इसकी तैयारी कर बुवाई कर देनी चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">बीज की मात्रा एंव बुवाई का समय</h3> <p style="text-align: justify;">5-8 किग्रा. बीज प्रति हेक्टेयर बुवाई के लिए पर्याप्त है। चूंकि बीज का छिलका कड़ा होता है इसलिए बोने से पूर्व बीज को रात में पानी में भिगोकर तथा छाये में सुखाकर बोना चाहिए, जिससे बीज का जमाव अच्छा हो सके।</p> <h3 style="text-align: justify;">बोने का उपयुक्त समय</h3> <p style="text-align: justify;">बोने का उपयुक्त समय 15 फरवरी से 15 मार्च तक पाया गया है। 15 मार्च के बाद फसल बोने पर अधिक पानी की आवश्यकता पड़ती है तथा तापक्रम बढ़ जाने के कारण उपज भी प्रभावित होती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">बुवाई की विधि</h3> <p style="text-align: justify;">बीज बोने से पहले खेत में पर्याप्त नमी सुनिश्चित कर लेनी चाहिए अन्यथा जमाव पर बुरा असर पड़ता है। इसकी बुवाई कतारों में 23 सेमी. की दूरी पर की जाती है। बोने के लिए 4-5 सेमी. कूंडों की गहराई पर्याप्त है। इससे अधिक गहरा बो देने पर बीज जमाव नहीं होता है। बोने के 15 दिन बाद अधिक पौधों को निकालकर पौधे से पौधे की दूरी 7-8 सेमी. कर देनी चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">उर्वरक</h3> <p style="text-align: justify;">40 किग्रा. नत्रजन एवं 20 किग्रा. फास्फोरस प्रति हेक्टेयर देने की संस्तुति है। शोध परीक्षणों में 60 किग्रा. नत्रजन की मात्रा देने पर फसल की उपज में काफी वृद्धि पायी गयी है। नत्रजन की आधी तथा फास्फोरस की पूरी मात्रा बोते समय कूंड में डालना चाहिए। नत्रजन की शोष बची आधी मात्रा बुवाई के 20-25 दिन बाद खड़ी फसल में देना चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">सिंचाई</h3> <p style="text-align: justify;">चेना की फसल में सिंचाई काफी महत्वपूर्ण है। सिंचाई की संख्या, मौसम तथा मिट्टी की किस्म पर निर्भर करती है। अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए 6-8 सिंचाई की आवश्यकता पायी गयी है। ध्यान देने की बात यह है कि प्रत्येक सिंचाई हल्की होनी चाहिए। अगर फसल की बुवाई फरवरी माह में की जाती है तो 4-5 सिंचाई पर्याप्त होगी। पहली सिंचाई पौधों में 2-3 पत्तियां आने पर करते हैं। तापक्रम बढ़ने पर एक सप्ताह या इससे भी कम समय में सिंचाई करनी पड़ती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">निकाई गुडाई</h3> <p style="text-align: justify;">पहली सिंचाई के बाद खरपतवार अवश्य निकाल देना चाहिए ताकि फसल की अच्छी बढ़वार हो सके एवं अधिक कल्ले निकल सकें। हल्की गुड़ाई भी कल्ले निकलने में लाभदायी हैं। अगर आवश्यकता हो तो दूसरी निकाइ भी 25-30 दिन के अन्तर पर कर देनी चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">बीमारियां एवं कीडे</h3> <p style="text-align: justify;">यह फसल झुलसा रोग से प्रभावित होती है। इस रोग से बचने के लिए 2 किग्रा. जिंक मैंगनीज कार्बोमेट (मैंकोजेब) अथवा जीरम 80 प्रतिशत 2 किलोग्राम या जीरम 27 प्रतिशत 3.5 लीटर आवश्यक पानी में घोलकर डालना चाहिए। तना छेदक एवं तने की मक्खी का प्रकोप फसल को काफी नुकसान पहुंचाता है। इनकी रोकथाम के लिए 1.250 लीटर क्यूनालफास कीटनाशक दवा का प्रयोग लाभदायक पाया गया है।</p> <h3 style="text-align: justify;">कटाई एवं गुड़ाई</h3> <p style="text-align: justify;">चूंकि ʺभावनाʺ प्रजाति पकने पर चिटकती नहीं है फिर भी जैसे ही फसल पक जाये कटाई कर लेनी चाहिए। कटाई के लिए जैसे ही पौधे का रंग पीला, भूरा एवं दाना कड़ा चमकदार हो जाये कर लेना चाहिए। फसल की कटाई यदि समय से नहीं की जाती है तो दाने जमीन पर गिरने लगते हैं फलस्वरूप उपज में कमी आ जाती है। डन्डे से पीटने या बैलों को चलाकर दाना अलग किया जा सकता है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>स्त्राेत : पारदर्शी किसाना सेवा याेजना, कृषि विभाग, उत्तरप्रदेश।</strong></p>